loving poetry

Tuesday, 15 May 2012

निर्मोहिया तू क्यों मोहे सतावे l
नित नित करे मिलन को वादों , फिर भी क्यूं ना आवे ll
गहरी नींद स्वपन में आकर , बैयाँ पकरि जगावे l
आँख खोल देखन को चाहूँ , कहीं नज़र ना आवे ll
उडुगन बना प्रेम अग्नी को , मेरो ह्रदय जलावे l
भोरे मन कूँ  देय दिलासो , जैसे चाह नचावे ll
प्रेम-पाश को फंदों करिके, पहले मोहे बँधावे l
खुद भी हँसे हंसावे जग को , मोहे नित्य रुलावे ll
दीनानाथ नाम है झूठो  , काहे जग भरमावे l
'अक्षर' सो अतिदीन हीन जब तोहे नज़र नहीं आवे ll

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