loving poetry

Tuesday, 15 May 2012

* अति विचित्र गति प्रेम की ज्यों ज्यों ह्रदय समात l
  'अक्षर' अपनो राज करि , ह्रदयन हू विलगात ll
* महँगो रस्तो प्रेम को , दुःख बाढ़े सुख खोय l
  दुख में सुख अनुभव करे , 'अक्षर' प्रेमी होय ll
 * प्रेमी सदा पतंग सम , प्रेम अगन जल जात l
  ताहू उफ़ बोले नहीं , 'अक्षर' प्रमुदित गात ll
* प्रेम बाण की मार सों , मरे हजारों बार l
  'अक्षर' प्रेमी मर गया , फिर मरने तैयार ll
* 'अक्षर' जासों  नेह अति , सोही दीखे नाय l
  प्रेमी  भीतर बंद है , बाहिर कैसे पाय ll
* 'अक्षर' जब चाह्यो नहीं , मिल्यो हजारों बार l
  अब चाहूँ  तो  छुप गयो , प्रेम उलट व्यौहार ll
* नहीं मान सम्मान की , नहीं बदन की आश l
  'अक्षर' कुछ मांगू नहीं , जो तू रहवे पास ll
* बाहिर देखूं ना मिले , बंद नैन मिलि जाय l
  'अक्षर' फूटै नैन हू , जो प्रेमी बिलागाय ll
* प्रेम विकट जल धार है डूबे सों तिर जाय l
  'अक्षर' बाहिर आइके , फिरि फिरि भीतर जाय ll

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